मैं बातें उससे बेहिसाब किया करता हूं।
हर शिकायत, नाराज़गी उससे बांट लिया करता हूं।
कुछ तो बात है उसमें,
जो खयालों में भी उसे याद किया करता हूं।
वो आंखों की भाषा भी पढ़ लेता है
और अनकही भी सुन लेता है
वो नायाब इतना है कि
मैं तोहफा उसे जिंदगी का मान लिया करता हूं।
यूं तो औकात नहीं मेरी इतनी,
पर वो सखा मेरा कुछ ऐसा है,
मैं ख़ुदा से भी उसे अपने हिस्से में मांग लिया करता हूं।


