क्यो हो तुम इतना कठोर मेरे लिए
जेसे जमीं रेत को औढकर बन जाती है बन्जर
क्यो हो तुम मुझसे इतना दुर
जेसे चारों ओर फेला आसमां
क्यो हो तुम इतने खाली मेरे लिए
जेसे खारे पानी से लबालब भरा समन्दर किसी प्यासे के लिए
और में उस सुखे पेड कि तरह जो खड़ा है शान्त सा मजबूत
मगर खोखला भीतर से


