मुझे बता दो क्या किरदार निभाऊं,
घर की सभ्य नारी या
बाजार की वैश्या कहलाऊं,
अपने वजूद के हक में बोलूं
या पितृसत्ता का गान सुनाऊं,
ऐसा कोई लिबास बता दो
जिसमें मैं खुद ही छुप जाऊं;
तुम बता दो एक स्त्री की पहचान क्या है
मैं कौन सी नई परिभाषा लिखूं की
जिसमें नहीं कलंकित स्त्री का मान हुआ है
वह अहिल्या हो या सीता
अग्निपरीक्षा दोनों के हिस्से आई
ना में राधा ना में मीरा
मगर प्रीत मैने भी मन से निभाई
वो समय बड़ा बलवान रहा था
जब लाज द्रौपदी की रखने मनोहर आए थे
पर में तो कलयुग की नारी ठहरी
इस परीक्षा से कैसे बच पाऊं?
ऐसी घनघोर घटाओं ने जकड़ा मेरे आंचल को
रूप धरा ऐसा भयावह;
में इस आंधी से क्यूं ना घबराऊं?


