उसकी झलक मुझमें दिखती है...
कभी बात के लहज़े में, कभी मेरी हंसी में खनकती है;
साहित्य में रुचि हो या हाथों में स्वाद,
पौधों से प्रेम हो या गुनगुनाने का अंदाज;
मानो न मानो तुम्हारा गुस्सा और ज़िद्दीपन भी नहीं आया बाज़!
मेरी हर कला में तुम्हारी द्युति समाई है,
मेरा अस्तित्व ही तुम्हारी परछाई है!
माँ की प्रभा बेटी में चमकती है,
उसकी झलक मुझमें दिखती है।

