यह नौ महीने का गणित समझ के परे है,

बड़ी मासूमियत से ममता ने इस रिश्ते में रंग भरे हैं;

निश्छल प्रेम में बस ज़रा सी बेईमानी थी,

हर बार कड़वी दवा मीठी बोलकर खिलानी थी;

उसकी चिंता उसकी आँखों से छलक जाती थी,

कुछ इस क़दर वो कसकर गले लगाती थी;

अपनी माँ को खो देने का डर मेरे मन में यूं समाया था,

एक पाँच साल की बच्ची ने कभी पूरा स्कूल सिर पर उठाया था;

बचपन से ही मैं अड़ियल और मनमानी थी,

डाँट पड़ने पर कभी भी बात न करने की ठानी थी;

खाना नहीं खाने की धमकी बहुत काम आती थी,

माँ सब हार कर कौर खिलाने बैठ जाती थी;

न ही खाने में तुम्हारा वाला स्वाद है,

न ही बालों में चम्पी वाले हाथ हैं,

बस बारिश की वो याद साथ है,

जब काले बादल और बिजली से मैं घबराती थी,

मुझे बहलाने को तुम पानी में कागज़ की नाव चलाती थी;

बेफ़िक्र हंसी के पीछे उसने बहुत कुछ छुपाया है,

ज़िन्दगी जीना मुझे माँ ने सिखाया है।