जिससे आंखे भी सिंक सकें जो रोटी भी सेंक सके, परिभाषित हो नारी!

जो आंसू पी कर चुपचाप ज़ुल्म सेह सके, कुछ यूं अनुशासित हो नारी!

दो घर का बोझ संभाले खुद बोझ कहलाए, ज़रा पारिवारिक हो नारी!

बलात्कारी समाज लेकिन शर्मसार वो हो जाए , बहुत लाचार हो नारी

लांछन सोच का कपड़ों पर लगाया जाए, संस्कारों की हार हो नारी!

एक दिवसीय त्योहार हो या सृष्टि के सृजन का आधार हो नारी?

बेगैरत बाज़ार में ठेकेदारों का मात्र व्यापार हो नारी!!

विचारों के मझधार में सामाजिक नौका विहार हो नारी!!