बेफिक्र से फिक्रमंद हो गए,


यार अब कुछ चंद हो गए...


बकैती में शाम ढल जाती थी कभी,


अब किस्से कहानी हमारे कविता औ' छंद हो गए!


आज झुंझलाकर समझाते हैं उल्टा उन्हें,


जिनसे कभी गलतियों पर मार भी पेट भर खा लेते थे;


अमाँ छोटे मियाँ ज़रा ज़्यादा ही अक्लमंद हो गए!