
यूँही जब शाम को छत पर बैठा रहता हूँ,
तुम्हारे ही खयालों में डूबा रहता हूँ,
मन ही मन में तुमसे बातें करता हूँ,
तुम मेरी फ़िक्र करो या ना करो,
मैं तो बस तुम्हें ही रचा करता हूँ।
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यूँही जब शाम को छत पर बैठा रहता हूँ,
तुम्हारे ही खयालों में डूबा रहता हूँ,
मन ही मन में तुमसे बातें करता हूँ,
तुम मेरी फ़िक्र करो या ना करो,
मैं तो बस तुम्हें ही रचा करता हूँ।
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