महसुसियत  


सुबह-सुबह वो वातायनो से आती हुयी

उन मधुर आवाजों को गुनगुनाती हुई | 

बस एक सीढ़ी उतर कर बाग़ीचे में , 

वो जो ओस रेशे की तरह गिरे हुए हैं 

उन गुलाबों की पंखुड़ियों पर |

उसकी उँगलियों की चंचलता ने 

उस पर से चाँदी सी चमकती हुई

परत जैस हटायी | उन नाजनीं उँगलियों 

के अन्तिम शिरे से लेकर हृदय के उस

पावन कुन्ज तक , सिर्फ़ एक स्पर्श ही नही ,

ना ही केवल सिर्फ़ एक छुअन मात्र हैं |

ये तो पूरे तन-मन में जैस श्रृंगार से लिपटी

लरजिश की अकल्पित भावना दौड़ी हो |

हाँ कुछ इसी तरह मैं तेरे अधरो से निकले

अपने हिस्से हर लब्ज को महसूस करता हूँ 


~cvm_poetry प्रयागराज