आज फिर कलम उठाने की

हूक दिल में उठी है।

लगता था कि ये कलम भी

मुझसे रूठ गई है।

जैसे रूठे कुछ अपने

और कुछ गैर

गैरों की तो फितरत में ही था

लेकिन कुछ ने बहुत साथ निभाया


इन्सानियत की बात न पूछो

वो ईद का चांद हुई है।

नकाब पर नकाब ओढे

बैठे वे लोग

मातम मनाने की जगह

जश्न में मशगूल है।


बहुत प्यारा था जहां

नज़ारे भी कुछ कम न थे।

फिर क्यों ज़हमत उठाकर

शुरू कर दिया

अपनी ही बर्बादी का आलम।

वक्त की ताकत के आगे

हम तो पहले ही कमज़ोर थे।


हमें न तकलीफ न जलन

हमें तो मोहब्बत की दरकार है।

क्यों न करें हम ऐसा

हम भी तो इन्सान हैं।

                             ~शिवाक्षी