ये चूड़ियां
कलाइयों पर नाचती, खनकती ये चूड़ियां ।
एक कंगन को मिलकर, मात देती ये चूड़ियां।
चेहरे पर मुस्कान के रंग ,बिखेरती ये चूड़ियां ।
जरा सी चूक पर ,कलाई को रंग देती ये चूड़ियां।
सुहागिन के श्रंगार में , शुमार ये चूड़ियां ।
साजन को खनक से , जगाती ये चूड़ियां ।
मुनिया के नन्हे हाथों में , मां की वह बड़ी चूड़ियां ।
भजनों में श्याम द्वारा, बेची जाती ये चूड़ियां ।
तो फिल्मों में हाथों में ,सजती नौ-नौ ये चूड़ियां।
जीवन की भावनाओं को , पल में दर्शाती ये चूड़ियां ।
दुखों में सिमट कर, एक रह जाती ये चूड़ियां।
तो त्योहारों में भरे हाथ , नजर आती ये चूड़ियां ।
कामकाजी हाथों में, घड़ी संग इठलाती ये चूड़ियां।
रोज सवेरे चौके में , आटे से सफेद हो जाती लाल चूड़ियां।
मजहबी भेद मिटाती , दुर्गा की हरी चूड़ियां।
टूटने पर खेलों की , गोट बन जाती ये चूड़ियां ।
जल्दबाजी में हाथों की , चोट बन जाती ये चूड़ियां।
जीवन के एकांत को , तोड़ती जीवन्त ये चूड़ियां ।
एकाकीपन में स्वयं ही, टूट जाती ये चूड़ियां......
............................✍शिवा पाठक

