सागर के बाहर मोती

मोती केवल सागर की,

गहराई में ही नहीं मिलते ।

कभी देखा है तुमने उनको,

सागर के बाहर भी खिलते।

कभी देखा है बारिश के बाद,

बिजली के लंबे तारो को ,

उनपर लटकती पानी की बूंदों को।

कभी देखा है कमल के पत्तों को ,

पत्तों पर दौड़ती नाचती बूंदो को ।

जद्दोजहद में सुखाते गीले बालों को,

देखा होगा हवा में कुलांचे भरती बून्दो को।

हां ; हमने देखा है, सागर के बाहर मोती को ।

हमने देखा है ......

गुब्बारे के लिए रोते मचलते ,

बच्चों के प्यारे गालों पर लुढ़कते आंसुओं के मोती ।

कड़े परिश्रम के बाद ,

मिलने वाले सफलता के मोती।

हलवाई की कड़ाही में इठलाते,

मन मोह लेने वाले बूंदीयो के मोती।

बिल्कुल हर मोती सागर की गहराई में नहीं मिलते ,

हमने देखा है उन्हें सागर के बाहर भी खिलते ।

शिवा पाठक