पेड़ पर खुशी से झूमते- नाचते ,
नादान पत्ती को देखती हूं जब भी,
लगता है कितना गर्व है पत्ती में इस बात का,
कि पेड़ केवल उसका ही है ।
नासमझ नहीं जानती........
पेड़ ना जाने कितनी पत्तियों का है......।
सागर में अपने आप को सहजता से,
समर्पित करने वाली नदी मे भी ,
कहीं ना कहीं दंभ दिखता है मुझे इस बात का,
कि सागर उसके ही इंतजार में है।
वह भी कहां जानती है......
सागर न जाने कितनी नदियों को
आगोश में ले चुका है उसके आने तक.....।
एक बूंद पानी अपने पर पड़ने से,
मिट्टी अपनी सोंधी सुगंध से वातावरण को देती है संदेश,
बूंद से अपने मिलन का ,
अनजान इस बात से की,
आने वाली कई बूंदे....
उसके ही अस्तित्व के सामने प्रश्नचिन्ह खड़ा कर देंगी.......।
अफसोस बस इस बात का है..
पत्ती, नदी, मिट्टी के रूप में ....
निर्दोष एकनिष्ठता हर बार छली गई..... ।
...............शिवा पाठक✍
