बहुत विचार करने पर लगता है,

इंसान का इंसान होना बेशक कठिन होगा,

पर इंसान का अमलतास होने जितना कठिन नहीं।

गेहूं की बसंत में वह लहराती हरी बालियां भी,

जिस समय हारकर सुनहरी हो जाती हैं,

उस समय हरा होता है यह अमलतास।

व्यक्ति अपने हरे जख्मों की कितनी रक्षा करता है,

पर लू के थपेड़ों में,

हरापन स्वच्छंद छोड़ने का दम भरता है यह अमलतास। नवविवाहिता की हरी चूड़ियां कितनी संजोई जाती हैं,

क्यों ना संजोई जाए नवजीवन का नयापन जो है ,

पर नया जीवन तो अमलतास की हरी पत्तियों में भी है ,

फिर उनको यू निश्चिंत झूमने देना उसके लिए आसान कैसे ?पीले फूलों का नाम सबसे पहले सरसों की याद दिलाता है,

पर उसके फूलों पर वह मंडराता ,

काले भवरे जैसा नजर का टीका तो नहीं ।

पीला रंग तो विदाई का दुख झेलने वाली,

उस लड़की के हाथ में भी है,

पर अमलतास के पीले फूल तो हर जेठ,

हर वर्ष विदा होने का दुख झेलने के साथ आते हैं।


मेरे घर के बाहर 2-2 अमलतास के पेड़ हैं।

उनको देखना ,

मानो जीवन की चुनौतियों का सामना करने की प्रेरणा पाने जैसा है ।

जैसे कि हर लू के थपेड़ों में ,

सम बने रहने की सीख ।

जैसे कि सबके हार मानने पर भी,

डटे रहने की सीख।

जैसे की कठिनाइयों में भी ,

हरे भरे रहने की सीख।

जैसे कि संघर्षों में भी ,

फूलों सा मुस्कुराने की सीख ।

शिवा पाठक