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मजदूरों का दर्द

लावारिश बनकर फिरता हूं मैं गलियों और चौबारों में।

भौरों को अब नहीं पूछता कोई खिली बहारों में।


बन कर दीप जले हम जिसको मंजिल तक पहुंचाने में।

बनकर हवा वही चल रहे हैं हमको आज बुझाने में।

जिनको हमने अनमोल बनाया , 

वे खड़ा कर दिए हमको अब बाजारों में।


जिनके तम को निगल गए हम खुद ही तम में घिरकर।

आंसू जिनके छीन लिए हम खुद आंसू में होकर।

जिस को हमने ही कर्ण बनाया ,

वे भेंट रहे हैं हमको ही अब अपने उपहारों में।


जिनके पथ हम आसान किए, वे हमें गरलता देते हैं।

देकर कठिन रास्ते हमको , कहे सरलता देते हैं।

जिनके पीछे चलकर हम उम्मीदें जगाया करते थे,

भूल गए हैं वे हमको अब आकर के सरकारों में ।


हीरो जिसको हमने बनाया वे जोकर हमको बना रहे हैं।

नभ तक जिसको पहुंचाया, वे धरती में हमें दबा रहे हैं।

जिनको हमने चांद बना

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