लावारिश बनकर फिरता हूं मैं गलियों और चौबारों में।

भौरों को अब नहीं पूछता कोई खिली बहारों में।


बन कर दीप जले हम जिसको मंजिल तक पहुंचाने में।

बनकर हवा वही चल रहे हैं हमको आज बुझाने में।

जिनको हमने अनमोल बनाया , 

वे खड़ा कर दिए हमको अब बाजारों में।


जिनके तम को निगल गए हम खुद ही तम में घिरकर।

आंसू जिनके छीन लिए हम खुद आंसू में होकर।

जिस को हमने ही कर्ण बनाया ,

वे भेंट रहे हैं हमको ही अब अपने उपहारों में।


जिनके पथ हम आसान किए, वे हमें गरलता देते हैं।

देकर कठिन रास्ते हमको , कहे सरलता देते हैं।

जिनके पीछे चलकर हम उम्मीदें जगाया करते थे,

भूल गए हैं वे हमको अब आकर के सरकारों में ।


हीरो जिसको हमने बनाया वे जोकर हमको बना रहे हैं।

नभ तक जिसको पहुंचाया, वे धरती में हमें दबा रहे हैं।

जिनको हमने चांद बनाया,

वे गिनते भी नहीं हमें अब है लघु तारों में।


हमने उन्हें मधु सौंपा, वे हमको गरल पिलाते हैं।

जटिल थमाकर हमको वे बाते सरल बताते हैं।

हमने उन्हें बसंत था सौंपा ,

वे बबूल बन रहे हैं आज सजे सृंगारो में।


जिनको हमने पार लगाया तूफानी लहरों से।

जिनको हमने ऊपर उठाया नदी के तट गहरों से।

जिनको हमने मंजिल तक पहुंचाया,

वे भंवर बन रहे अब मेरी पतवारों में।


इत्र बांटते जो फिरते हैं गंध मेरी ही समेटे है।

लहू गिरा है मेरा धरा पर तभी शांति से लेटे है।

खुसबू बनकर बड़ी बड़ी जो महफ़िल आज सजाते है,

शोभित होते हैं जो आज परिणय वाले हारों में।


देकर महल दूसरों को हम डगरों पर जो दिखते हैं।

देकर अपना भविष्य आज हम स्वयं सबक सिखते है।

शिलालेख हम गढ़े सभी के,

हम को जगह मिल रही है आज अख़बारों में।