कोई बेवजह बदलता नहीं है
बदलता तभी है जब संभलता नहीं है।
स्वप्न के स्वप्न से
निष्ठा के प्रयत्न से
इच्छाओं के प्यास से
जीवन की स्वास से
स्वयं के अहसास से
सूख जाता है
सूखता तभी है जब खिलता नहीं है।
स्वयं के मौन से
स्वयं के कौन से?
स्वयं की विस्थापना से
स्वयं की निष्ठुरता से
भावों की विहवलता से
फूट जाता है
फूटता तभी है जब भरापन निकलता नहीं है।
प्रश्नों के हल से
मन के छल से
भावों की उदारता से
तन की कुंठाओ से
निजता की आशाओं से
रूठ जाता है
रूठता तभी है जब कुछ मिलता नहीं है।


