माँ, मुझे रौशनी से डर लगता है |

 

माँ, मुझे रौशनी से डर लगता है | 

पास आती हर ख़ुशी से डर लगता है |

कहते हैं , दर्द की कमी नहीं इस बाज़ार में,

पर माँ , मुझे तो दर्द मिटाने वालों से डर लगता है |

 

कहते हैं चांदनी चार दिन की होती है ,

खुशियाँ कहाँ हर किसी के किस्मत में होती है,

किसी को अगर मुझे रुलाना है तो रुलाले ,

मुझे तो हसाने वालों से डर लगता है |

 

और खोयी बहुत हूँ इस माया नगरी में ,

कई बार डूबी हूँ भाव के समंदर में ,

किसी को अंधकार में फिर से डुबोना है तो डुबोले,

क्योंकि माँ मुझे तो रौशनी से डर लगता है |  

 

--शिल्पी बनर्जी