उसे सपने देखने के लिए नींद की जरूरत नहीं है।

अभी सुबह के 5:00 बजे ही थे कि उसकी नींद खुली ताकि वो जागते आंखो से जो सपने देख रही है उसे वास्तव में पूरा कर सकें।

यहां बात हर उस लड़की की हो रही है , जिसके आंखो में सपने तो बहुत हैं लेकिन उसे पूरा करने के लिए जिस हिम्मत की उसे जरूरत है वो उसके पास नहीं।

हां वास्तविकता यही है कि सपने तो बहुत है लेकिन सारे अकेले के समर्थ से पूरे हो, ये कैसे संभव है, बिना माता पिता के सहयोग से ऐसे सपने को पंख कैसे मिलेंगे?

मुश्किलें तब और बढ़ जाती हैं जब कोई बाहर वाला ये कह दे कि लड़की है ना, और माता पिता भी लड़की होने का बहाना देकर उसके सपनों की ओर जाने की वजह अपने कदम पीछे कर ले।

हालातों से जूझती लड़ती रहती है एक लड़की, कठिनाई तब और बढ़ जाती है जब वो किसी गरीब परिवार या मिडिल क्लास से हो, यक़ीन बहुत सेहना पड़ता है।

यक़ीन नहीं किया जा सकता लोग अपने घर में मां बहन, बेटी को भी परेशानी से लड़ते देखते हैं उसके बाद भी महिलाओं को पूरे हक से आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहन नहीं देते हैं।

कुछ तो कमी रखता है ये समाज वरना हमें इतना ढिंढोरा पीट कर वूमेंस डे मनाने की क्या आवश्यकता थी।


Written by Shilpa Ranjan

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