मैं मुसाफ़िर मन की रही
कभी ना जीने की
तो कभी ना मरने की जरूरत पड़ी
आसान नहीं है सफ़र ए ज़िंदगी
फ़िर भी बहाना जीने का करती रहीं
आज़ाद मन परिंदों सा है
एक टहनी पर रुकता ना है
कहीं तो सुकून रखा मिलेगा
मूसालसल बैचैनी को सुकून मिलेगा
इसी इंतज़ार मैं बढ़ती रही
देखा होगा तूने भी
अपनी ही खोज में मैं कितना चलती रही


