ज़िंदगी का सबसे सुनहरा मौका होता है बचपन, ना कमाने की जरूरत थी, ना किसी बात की कोई चिंता थी।

हर गुलामी से आजाद बचपन और वर्षों से चली आ रही परंपरा के अनुसार घर वाले बोलते रहते थे नहीं पढ़ोगे तो क्या होगा तुम्हारा, ऐसा, वैसा वगेरह वगेरह। वो अलग बात थी कि ये बातें उस वक़्त दिल को चीरती या भेदती नहीं थी, और मन ही मन हम मुस्कुराते रहते थे।

अगर देखा जाए तो सही मायने में जीवन हमने जिया है, बचपन के कीमती यादों को संजोया है, तब मोबाइल वाली कोई बात नहीं थी, और ना ही हमारा बचपन वीडियो गेम से वंचित था, इसलिए उस समय की बात कुछ और थी, जैसे

*वेन में चिल्लाते हुए स्कूल जाना।

*स्कूल में कहीं पड़ी मिली पेंसिल ,रबर उठा कर घर ले आना फिर घर पर डाट खाना, और ये सुनना की आगे से ऐसा मत करना, ठीक है कह कर मन ही मन पेंसिल ,रबर की गोदाम खोलने की सोचना।

*स्कूल से चाक जमा कर लाना और हर जगह उस चाक से अजीबो गरीबों चीज़ बनाना।

*स्कूल में लंच के समय ये देखना की किसने बढ़िया लंच लाया है, जिसने बढ़िया लंच लाया है उसके लंच बॉक्स में अपना लंच डाल देना, ताकि वो भी हमसे अपना लंच शेयर करें।

*आंधी तूफान आने से पहले ही झोले के साथ आम के पेड़ नीचे खड़े रहते थे, वहां आज की प्रतियोगी परीक्षा से भी ज्यादा भीषण प्रतियोगिता होती थी।

*होली दीवाली पर पूजा पाठ की चिंता हमें नहीं रहती थी, हमारे लिए दशहरा पूजा पंडाल देखने के लिए होती थी, होली खाने के लिए, दीवाली फटाखा जलाने के लिए होती थी।

*नए बैग, लंच बॉक्स, पेंसिल बॉक्स मिलने की असीम खुशी हुआ करती थीं, किसी उत्सव से कम नहीं होता था वो दिन जब हमें कुछ नया लेकर, पहनकर स्कूल जाते थे।

*वीडियो गेम जिन दोस्तो के पास होती थी उनसे हमारा लगातार द्विपक्षीय वार्तालाप होता रहता था।

*और शाम की ट्यूशन के बाद जिस गति से अपने दोस्तों से मिलने जाते थे, उस गति को अभी तक किसी सुरक्षा विमान ने भी टक्कर नहीं दिया।

और ना जाने ऐसी कितनी कीमती यादों से भरा हमारा बचपन था।

आज के बच्चो ने ये सब देखा ही नहीं है, उनकी ज़िंदगी में मोबाइल और उसपर मौजूद तमाम एप्लिकेशन ने जगह बनाई है, शायद उनके भविष्य में ऐसी यादों का जिक्र ना हो।

जरूरी है उन्हें भी इन चीजों के बारे बताया जाए, इन चीजों से वाकिफ कराया जाए, उन्हें भी ज़िंदगी की कीमती वक़्त से अवगत कराया जाए।