मै शिखा हूँ,
शिखा का मतलब जानते है ना आप लोग नहीं जानते तो मै बता देती हूँ।
शिखा माने दिये की लॉ, आग की लपट, पेड़ की शाखा, पहाड़ की चोटी और जो गुथ बाँधती हैं अक्सर लड़कियाँ उसे भी आप शीखा केह सकते है।
तो मै शिखा हूँ पर मै ईन सारे अर्थो मे से कुछ भी नही मै शायद ईन सबके लेश मात्र भी नही।
मै तो सिर्फ़ शिखा हूँ लाखो की भीड़ का एक चोटा सा हिस्सा या सही मायने में कहूँ तो लाखो संज्ञाओं मे से एक संज्ञा बिना किसी सर्वनाम के एक संज्ञा; सिर्फ़ शिखा बस एक नाम।
आप मुझे एक कर्ता केह सकते हैं जो अपने कर्म की तलाश मे है।
पर अब तलशू तो कहा कही सुबह की चाय मे अदरक की भांती मस्ली जाती हूँ, और बच जाऊ तो दोपहर मे मसलों के संग कुच्ली जाती हू और ईन सब से अगर बच बी गई तो रात के वक्त मदिरे की भांती हलक से निग्ली जाती हूँ।
और ये सब इसलिये नहीं क्युंकि मै एक लड़की हू, ये सब रंजिशे तो बस इसलिये है क्युंकि मै इन्सान नाम की एक अद्भूत प्रजाति से हू, जो की कथनी और करनी मे बडा भेद करती है और गर समानता आ भी जाए तो मुझ तक आते-आते बिच मे कही दम तोड़ देती है।
अब सिर्फ इन्सान होना हमरी सबसे बड़ी उप्लब्धि है ये तो सुने थे पर ई कोनो बताया नही हमको की पुरुष जोना भी उतना ही ज़रूरी है।
अब हुम ठहरे औरत जात ऊपर से मजदूर इस पुरुष प्रधान सामाज मे। बराबरी की गुहार लगाने वाले नही है बस दिक्कत हमारी इतनी सी है की हुम गलत को गलत और सही को सही कहने मे झिझकते नही और यही कारण है की हुम इस समाज को नामंजूर है।
तो बस इसलिये रोज नया काम पकडते है और रोज ही निकाले जाते है, क्युंकि जो सेठ जी है साहुकार हमारे वो लिंग देख कर तन्ख्वाह देते है थ अगर अधिक तन्ख्वाह चाहिये तो या तो पुरुष बनो नही तो किसी पुरुष के अधीन हो।
और दोनो ही हमको ना-मंजूर है।
अब हम मानते है, की पुरूषो जितने काबिल नही है।
पर इस बात का एहसास हमे हमारे नाकामी ने नही बल्कि सामाज के दोहरे माप-दंडो ने दिलाया। जिसके हिसाब से औरत का काम है घरेलू काम करना कपडे, बर्टन आदी और मर्द का काम है बहर जाके पैसे कमाना। पर एक बात बताओ हुम्को ई कोन बोला की औरत को काबिल बनने के लिये किसी मर्द को अपने अधीन करना पड़ता है या किसी मर्द के अधीन होना पड़ता है। किसी की तबिलिया उसकी शरीर की बनावट कैसे तै कर सकती है।
और एक बात बताईये ज़रा "जो मादा! प्रजाति को वृष्तृत कर सकती है वो क्या नही कर सकती।
भला जननी को किसी के अधीन होने या किसी को अपने अधीन करने की क्या आवश्यकता। और जो लोग कहते है की पुरुष और औरत समान है तो उन्हे भी हुम बता दे की अगर दोनो एक बराबर होते तो दोनो अलग क्यूं होते एक ही ना होते।
और कोई किसी के अधीन नही है बल्कि एक दुसरे के पुरख है, एक ही सीके के दो पहलुओं की तरह। जहा तक हमे मालुम है समाज पुरुष प्रधान रहा है इंसानियत नही। और अगर अधिन्ता जायज़ है तो आप संविधान उठा कर देख लिजिय। हुम तो ज़्य्दा पढें लिखे नही है पर आप तो लगते है। हुम ज़्य्दा नहि जानते जितना जानते है हुम उसी हिसाब से बोले।
बाकी काम के लिये देर हो रही है, पर हाँ औरत और आदमी अच्छे और बुरे के अलावा एक और तरीके के होते है उन्हे हुम अक्सर इन्सान कहते है, जिनके लिये इंसानियत किसी भी लिंग से ऊपर है।
नमस्कार।।

