वो मुझमे नुक़्स निकालकर ऊंगलियो पर गिनाते रहे,

मैं उनकी बातो को गहराईयो से सुनता रहा,

दिलो मे मैल थे वो होंठो से थे झड़ रहे

मैं उनको बस गहराईयो से सुनता रहा,

वो मुझपे आरोप लगाते रहे

मैं उनके आरोपो को गहराईयो से सुनता रहा,

कभी-कभी ये खामोशी भी जरिया बन जाती है

चुप्पी ही अनेको बात कह जाती है,

मगर वो मूर्ख समझते नही खामोशी,

वो इल्जाम लगाते रहे

मैं गहराईयो से सुनता रहा ,

मैं अपना दर्द कैसे बताता

वो तो मेरा अपना था

वो मुझमे नुक़्स निकालता रहा

मैं गहराईयो से सुनता रहा ।