धुएं के छल्ले उड़ाने मे जिसकी शान है
उसकी जोरू की घूंघट मे घूटती जान है ,
पान और पुड़िया खाते है शौक से
उसके जोरू के चेहरे की रौनक खामोश है,
ठहाके लगाते हैं बाहर मे जो खुद
घर मे उसके जोरू की मुस्कान खामोश है,
अपनी भी गलती पर आंख दिखाते
उसके जोरू की रात खराब है,
जोरू का दर्द समझते नही जो
उसके तो नसीब ही खराब है ।
