हम भी ना

कितने इमोशनल इंसान है कि

वास्तविक और काल्पनिक में फर्क ही नहीं समझ पाते, 

जो काल्पनिक है उसे वास्तविक समझ लेते है और जो वास्तविक है उसपे यकीन ही नहीं कर पाते है, 

शायद ये इसलिए भी होता है कि 

काल्पनिक वालो का अभिनय शानदार होता है मगर वास्तविक वालो का नहीं, 

काल्पनिक से हम खुद को जोड़ पाते है

वास्तविकता से हम खुद को जोड़ ही नहीं पाते, 

और तो और वास्तविकता में तो लोगो को अभिनय ही 

करने नहीं आता ।