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गाँव के बाशिंदे


शहर के लोग कहीं भी उठने बैठने खाने पीने के बारे में सौ बार सोचते हैं साहब,हम तो गाँव के बाशिंदे है ,

कहीं भी सोते है कहीं भी खाते है,हमें इन सब चीजो की कोई फिक्र ही नहीं होती है ।

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