ये जो बंजर जमीन पर सदियों से बारिश नहीं हुई,

ये जो सूखे से पत्ते भी शाखों से गिरने लगे हैं,

ये जो आफताब और मेहताब को पाने में तारे भी खोने लगे हैं,

यू जो बैठे-बैठे आंसू भी गिरने लगे हैं,

उठी वो लहर जो खुद का ठिकाना पूछ रही है,

वो उड़ती हुई चिड़िया जो अपने ही घर जाने का रास्ता ढूंढ रही है ,

यू लाखों की भीड़ में जो खुद को अकेला पाया है,

न जाने किस की जुस्तजू है न जाने किस की आरजू है।

-साची मौर्या ( शिकस्ता)