आज सुबह सुबह ही खुल गया
अलमारी का बन्द कोना
जिसमें रखी थी
एक अधूरी मोहब्बत की दास्तान
कुछ अधूरे ख़्याव,कुछ बेकाबू जज़बात
सावन की पहली बारिश का
वो एक भीगा लम्बा
वो कभी न खत्म होने वाला रास्ता
साथ टहले थे,जिसमें हम
आज भी पड़ा है,वो सुनहरा ब्रासलेट
जो अपनी मोहब्बत की निशानी में
तुमने मेरे हाथ में पहनाया था
और ,,वो फोटो
तुमसे नज़र बचाकर
तुम्हारी एलबम से चुराया था
वो नज़्में ,,,वे गज़लें
जिसे तुम्हारी याद में गुनगुनाया था
और ,,,,,भी न जाने कितनी यादें
उस बन्द कोने के खुलते ही
मेरे पास चली आयीं
फ़िर यूं हुआ,,,उन यादों का बोझ
मैंने दिन भर ठोया,,और रात में
उन यादों को सिरहाने रखकर
बरसों बाद
फ़िर आँसुओं की बारिश में
अपना तकिया भिगोया ,,,,,,,!
शिबली सना
इलाहाबाद


