चेहरे पे जो ये नकाब लेके चल रहे हो

क्या दर्द है? क्या छुपा रहे हो?

क्या महसूस कर रहे हो? क्या जता रहे हो? 

गर बोझ हो रहा हो इसे पहनने का

तो क्या वजह है? जो बयां नही कर पा रहे हो?


क्या फरियाद है, जो गर्दिश मे फसे हो?

हकिकत मे तुम आगे बढ रहे हो

कौन सी इज्त़िराब मे उलझे हो?

अपनों से बया कर के इसे सुलझा दो 

                                 

इस नकाब को जरा हटाके तो देखो

बाहर आकर बाकी दुनिया को तो देखो

नकाब की मुसलसल दिखेंगी यहा जनाब 

उसके भीतर छुपे “इंसान” को

जरा झांक कर तो देखो


गर मिले कोई ऐसा, नकाब मे जीने वाला

तो उसे हटाने की कोशिश जरूर करना

आज तुम कर रहे हो, कल वो भी करेगा  

जो ये सिलसिला जारी रहेगा

तो कोई भी नकाब से, ब-दस्तूर हो जायेगा 


काश ये नकाब, सारे जहाँ से हठ जाए 

इस मुंतज़िर मे कोई, मोजज़ा हो जाए

कोई भी इस पर, मोहताज ना हो पाए

ताकि इस हयात मे कोई

इक कब्र मे ना रह जाए