ज़ख्म अब भी करते हैं तेरी ही तरफदारीइश्क में क्या इतनी जायज है वफादारीजिनके त'अश्शुक़ में हम सब कुछ लुटा बैठेवो हमसे मांग बैठे अपने इश्क की रंगदारी
ज़ख्म अब भी करते हैं तेरी ही तरफदारीइश्क में क्या इतनी जायज है वफादारी
जिनके त'अश्शुक़ में हम सब कुछ लुटा बैठेवो हमसे मांग बैठे अपने इश्क की रंगदारी