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मुसर्रत


कफस में भी होने लगी है मुसर्रतइश्क जो मुझको इक अहेरी से है

खौफ भी मुझको देखकर है हैरानमेरा यकीन भी उस काफिर में है

जानता हूं कुछ हासिल ना होगा मुझेहाथ मेरा फिर भी उसके हाथों में है

— शैलेंद्र शुक्ला "हलदौना"
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