क्यों नाराज हूं खुद से जवाब नही आता
परेशान हूं खुद से कुछ समझ नही आता!!
जो तय किए थे नियम कभी अपने लिए
उनको अब हमसे निभाया नही जाता !!
कुछ तो बदला इन दिनों हम दोनों के दरमियां
वरना पास रहकर भी यों फासला ना होता!!
कभी हाथ संभालने की होती थी बातें
अब वही हाथों से निशाना बनाया है जाता!!
दूर कितने निकल गए तुम पता ही नहीं चला
आवाज देने का भी अब असर नहीं है होता !!
कभी कुछ पलों का इंतजार सदियों सा था
अब वक्त ठहर ही जाए बस यही दिल है करता !!
ऊंची उड़ान की आकाश में सोचने वाले हम
आज खुद को जंजीरों में बांधने का मन है करता!!
खुशी पता नही कहां छुप कर जा बैठी है अंधरें में
क्यों उदास है जिंदगी मुझको समझ नही है आता !!
क्यों नाराज हूं खुद से जवाब नही आता
परेशान हूं खुद से कुछ समझ नही आता!!
शैलेंद्र शुक्ला"हलदौना"
ग्रेटर नोएडा


