में तो में बिकने को था तैयार
किसी ने दांव जो लगाया होता!!
सांसे भी गिरवी रखने को था तैयार
किसी ने भाव तो सही लगाया होता!!
बहुत कोशिश की भीड़ में शामिल होने की
किसी ने हिस्सा तो बनने दिया होता !!
दर दर ठोकर खा खा कर
कुछ अब निखर सा आया हूं
कुछ बहुत ज्यादा तो नहीं
थोड़ा खुद को जान तो पाया हूं
जो बिक जाता तो अनमोल ना होता
में अपने इतने करीब हो कर भी
खुदको कभी पहचान नहीं पाता !!
शैलेन्द्र शुक्ला “हलदौना”


