आज 'ख़ामोशी' से हम 'इंतकाम' लेंगे
तुम कहो तो , बस अपनी 'जान' लेंगे..
अच्छा नहीं लगता अब 'रोज़' मिलना
किसी दिन हम 'अपना' मकान लेंगे..
अजीब है न ये 'एहसास ए इंकलाब'
चलो किसी दिन इसे 'सच' मान लेंगे
मेरे इश्क़ को तुम 'इंकलाब' समझना
क्यूंकि इसमें हम 'सब कुछ' मान लेंगे