जो बड़ा पुराना ये शहर लगता है

इसकी दरों से मुझे डर लगता है।।


उसकी आंखों में जाके जाना मैंने

कितना प्यारा खुद का घर लगता है।।


सियासत ने पी लिया है मुल्क मेरा।

चुनाव जैसे बरपा कहर लगता है।।


ये पूछता रहता है एक पागल सबको।

भैया सच का मेला किधर लगता है?


मैं उन नकाबपोशो से बेजार हूं।जिन्हें

असली सूरत से अपनी डर लगता है।।


मुमकिन है इन रास्तो में कदम डगमगाए।

पर तेरी आहट से मीठा सफर लगता है।।


तेरे होठो का ये सुर्ख लाल रंग सखी।

जैसे सीने से निकला ख़ंजर लगता है।।



मैंने कब कहा की भगवान होते है तुमसे।

हा ये है की अंदर ही अंदर डर लगता है।।

मज़म(शेखर नैनवाल)