याद है क्या ?



मेरे साये में बिताये वो हसीं पल याद है क्या ?


वो जो ट्यूशन में तुम्हारे ठीक पीछे बैठता था 

ख़ुसरो की दूभर पहेली सी तिर वो उलझी ज़ुल्फ़े

जिन्हे आहिस्ते से छूकर स्वर्ग मे मैं झूमता था


और वो जब झील तीरे हाथ थामे शाम बीते

आँखों हीं आँखों में इक दूजे से कुछ वादे किये थे

जाने कैसे तुमने वो सब कुछ भुला दीं ,हाय प्रीते

घंटो सुनते हम जो जल कल-कल वो गोधल याद है क्या ?

मेरे साये में बिताये वो हसीं पल याद है क्या ?


जब मैं बारिश की बरसती बूँद सा बनकर तुम्हारे

सोने के नथ से गुज़र सूखे से होठों को भिगोया

मैं तिरी साँसों में और तू मेरी साँसों में था खोया

होठों से जो था किया व्यापार निश्छल याद है क्या?

मेरे साये में बिताये वो हसीं पल याद है क्या ?


जेठ की तपती पहर हो या तो हो सावन की बरसात

चाहे फागुन की हो पुरवैया हो चाहे जाड़े की रात

घर के बाहर पेड़ के मानिंद था रहता आस लेकर

इक झलक दिख जाए तेरा बस इसी का प्यास लेकर


जाने छत से नूर अब किस शख़्श पर होगा बरसता

जो कली सा नर्म था अब कैसा होगा वो फ़रिश्ता

अब भी तेरा हुस्न पहले की तरह सय्याद है क्या?

मेरे साये में बिताये वो हसीं पल याद है क्या ?