नम तखिये में दबी कुछ शामों को बुला कर
वो सावन जला दिए मैंने तेरे खतों को जला कर
धुँए के गुबार में एक सिसकी की आहट
एक आह अब भी बची है शायद जलने से।


नम तखिये में दबी कुछ शामों को बुला कर
वो सावन जला दिए मैंने तेरे खतों को जला कर
धुँए के गुबार में एक सिसकी की आहट
एक आह अब भी बची है शायद जलने से।