मेरी खिड़की पे कल मुस्कराया था
यकीनन वो तेरा ही साया था
कभी हाथ बढ़ाता तो कभी कद अपना
मैंने उजालों में तुझे आज़माया था
खिड़कियां बन्द थीं और जब सूरज भी सुस्त था
मैंने आँख के दर से एक मोती गिराया था
रातभर सुब्कियों ने तोड़ी खामोशियाँ
रातभर मैंने तकिया भिगोया था।
साहिल।

