अपने ही खून के कतरो में सिमट गई दुनिया,
कितना संगदिल आज ये समाज हो गया।
इस कदर धुंध भरी है फिज़ाओ में,
हर नकाब का भी आज एक नकाब हो गया।
चंद कागज़के कतिलो में बिकीं हैं खुवाहिशों,
मेरी मुरब्बतों का भी शायद कुछ हिसाब हो गया।
कितना तेज चलता है ये थमा सा वक़्त,
तुम गये मैं गया और वक़् खिज़ाहो गया।
नहीं अब और नहीं कोई नई कहानी 'साहिल"
जो होना था हो गया, बस बहुत हो गया।
साहिल
स्वरचित एवं मौलिक


