मैं नन्ही कली इक अंगना की मुझको भी तो पढ़ना था रोकी हैं क्यों मेरी राहें मुझको भी आगे बढ़ना था। किसने दिया मुझे ये जीवन क्यों छीना है मेरा बचपन ? तब बोझ है सिर पर ये पत्थर जब नई इबारत गढ़ना था !