जैसे मीलों के सफ़र के बाद,एक अदद छोटा सा पड़ावधूप में ठंडी छाँवइससे घबराना क्यों?तनिक ठहरो,थोड़ा सुस्ताओं दुनियाँ के कोलाहल से दूर,मन के भीतर के शोर को सुनों आगे निकलने की अंधी दौड़ में,कहीं कुछ छूट तो नही गया,कोई अपना रूठ तो नही गया जीवन की आपाधापी में, तन्हाई में डूबे आलम में,फुर्सत के चंद लम्हों में, एकांतएक अवसर है ,आत्म मंथन का,अबोल मौन को मुखर करों स्वयम से सम्वाद करों,अव्यक्त अनकही, अनहद ख़ुद से बात करो!!-----शीतल रघुवंशी