तुम्हारे जाने के साथ ही,पानी की तरह,वाष्प बनकर उड़ गया है,प्रेम मेरे जीवन सेलेकिन प्रकृति का यह नियम है कि वाष्पित जल कण,मेघ बनजाते है और संघनित होकर बरसते जरूर है!मैं भी उस पावसी प्रेम की बारिश का इंतज़ार करूंगी ....जब घनघोर घटाएं छाएंगी, बदलियाँ घुमड़ कर आएँगीरिमझिम सावन बरसेगा,तब हम-तुम बूंदों से अटखेलियां करेंगेफिरसे हराभरा प्रेम रस से सराबोर हो जाएगा मेरा मन तुम्हारे प्यार भरे आलिंगन से!!-----शीतल रघुवंशी