मै तुम्हें मिलूँगा

उन आोस के कतरो में

ठंडी हवाओं के झोंकों में

चुपके से सहलाऊँगा तुम्हारे बाल

और उड़ जाऊँगा उस ओर बनके बादल

फिर बरसूँगा तुम्हारे मन की धरती पे

और भिगो दूँगा तुम्हें और तुम्हारे अंतर्मन को

ढलती सुरमई शामों में बिखर जाऊँगा

सिंदूर बनके भर जाऊँगा तुम्हारी माँग में

आकाश गंगा के उन असंख्य तारों में

मैं भी देख रहा होगां तुम्हें बनके एक तारा

क्योंकि तुमसे बिछड़ के

रह न पाऊँगा मैं यूँही