ये सूनी राहें पुकारती हैं तुम्हें

ये खामोश निगाहें ढूंढती है तुम्हें,

ये गहरी वादियां गूंजती हैं तुम्हारी

खिलखिलाहटों से अब भी

ये पर्वतों की ऋखलाऐ

ये देवदारों के घने साये

अब भी बुलाते हैं तुम्हें

ये आंखें थक गयी हैं,

तुम्हारे इंतज़ार में,

सुनो न, किसी बारिश की तरह

आओ और भीगो दो

मेरे मन की धरती और ले चलौ

मुझे वहां , जहां मिलते है

धरती और आकाश.....