कृष्ण- पथ पर अब धर्मी नहीं चलता,
पाप का सिर धड़ से अलग नहीं करता,
मुक्ति,अध्यात्म पर मन नहीं रमता,
ऐसा व्यक्ति धर्मी हो नहीं सकता.
कर्म-अकर्म-विकर्म की जिसे सुध नहीं,
दैवीय गुणों का जिसे भान नहीं,
आसुरी गुणों का जिसे ज्ञान नहीं,
स्थितप्रज्ञ होना जिसका लक्ष्य नहीं,
वो धर्मी नहीं, वो धर्मी नहीं....
व्रज - रज में जो नहीं लोटता,
भजनों को सुन, जो नहीं झूमता,
विग्रह देख जिसका अश्रु नहीं बहता
ऐसा व्यक्ति धर्मी हो नहीं सकता.
राम वन गमन में जिसका दिल नहीं दुखता
सीता के चरणों का कांटा जिसके सीने में नहीं चुभता
श्री राम की सेना का सैनिक जो धर्मी बनता नहीं
वो नाम का धर्मी होकर भी धर्मी हो सकता नहीं
मिल रही थी राजसत्ता मिल गया वनवास है
हो रही जनता दुखी है , राम - मुख पर हास है
भक्त के आँखों से आंसू रुक नहीं है पा रहे
कर्तव्य पथ परप् रभु चरण बढ़ते ही हैं जा रहे
भक्ति का है मान किंतु कर्म रुक सकता नहीं
पापेश का सर काटने का प्रण किया मैंने यहीं
ले रहा करवट समय है , दुष्ट का संहार होगा
आ रहे हैं राम रण में , पापियों पर वार होगा
राम के जयघोष से गूंजता आकाशहै
शत्रु में है खलबली हो रहाहाहाकार है
राम की सीवीरता जिसने सीखी है नहीं
नाम का धर्मी सही, धर्मी हो सकता नहीं
