माया
गो गोचर जहँ लगि मन जाई, सो सब माया जानहु भाई
सत्य क्या , मिथ्या क्या
यह बतलाता हूँ
मिथ्या का पर्दा गिरा
सत्य का दर्शन कराता हूँ |
जो कुछ भी दिखता इन्द्रियों से
वो सभी कुछ मिथ्या है
प्रकाशता है जो इन्द्रियों को
केवल वही सच्चा है |
अस्तित्व केवल चेतना है
अज्ञानता ही वेदना है|


