जितने ज़ख्म मेरे जिस्म में जड़े हैं ,

उतने मोती समंदर के गर्भ में छिपे हैं।


आकार छोटा पर हौंसले बड़े हैं,

इसलिए हारकर भी हराने के लिए डटे हैं।


बुजदिल तो देखो सारे पस्त पड़े हैं ,

मगर हम अकेले ही जंग में खड़े हैं।


हारें हज़ार होकर भी अड़े हैं

हर मोड़ पर प्रारब्ध से लड़े हैं


रुह है घायल पर चेहरे से हंसे हैं ,

क्योंकि उम्मीद के पंख अभी भी लगे हैं।


अब क्या बयां करें हम सफर सजना

कर्म - किस्मत ने बुना जीवन अपना ||