ऐ ज़िन्दगी, तू भी कितनी अजीब है
कभी हंसाती , कभी रुलातीहै
कभी उठती , कभी गिरातीहै
कभी राजा, कभी रंक बनाती है
कभी अर्श पर बिठाती है
कभी फर्श पर सुलाती है
कभी शांत, कभी व्याकुल बनाती है
ऐ ज़िन्दगी, कितना हमें भटकाती है
हम चाहते हैं, तुम्हे पकड़ना, समझना
पर तू कभी हमारे हाथ न आती है
ऐ ज़िन्दगी, तू भी कितनी अजीब है
तू कभी रूकती नहीं
सदा चलती जाती है
तू कभी ठहरती नहीं
सदा बहती जाती है
कभी कितनी दयालु, कभी कितनी क्रूर है
ऐ ज़िन्दगी , तू भी कितनी अजीब है


