ये तारे....
सदा आते हैं
सूरज ढलते ही
सांझ होते ही
एक ही वक़्त पर
आते हैं...
शायद किसी का
इंतज़ार करते हैं
रुकते हैं
रात-रात भर
टिमटिमाते हैं,
झाँकते हैं...
इधर-उधर
रातों के अंधेरे में भी
नापते हैं सारा आसमान
फिर भी,
सदैव शांत-से
झाँकते रहते हैं...
और
भौर होते ही
ओझल हो जाते हैं
या
कहीं छुप जाते होंगे
भौर की आहट सुनकर
या शायद;
थककर चले जाते हैं
इंतज़ार करते-करते !
✍ Sheela S.

