रिश्तों के भँवर में...
मैं नारी !
उलझ गयी हूँ...
कहीं खो गयी हूँ...
ढूँढ़ती हूँ वजूद अपना !
तलाशती हूँ पहचान !
रिश्तों के भँवर में....
मैं नारी !
सिमट गयी हूँ...
धुँधली हो गयी है,
मिट-सी गयी है...
पहचान मेरी !
झाड़ रही हूँ मिट्टी;
छाँट रही हूँ...
नाम अपना !
रिश्तों के भँवर में...
मैं नारी !
दबी हुई भावनाओं
के बीच...
बिखर गयी इच्छाएं सारी !
ढूँढ रही हूँ मैं...
मन के कोने में;
सुकून अपना !
रिश्तों के भँवर में...
मैं नारी !
टूटे सपनों के टुकड़े...
खोये अरमान अपने...
गुम हो गये हैं;
पैरों के तले !
उम्मीद है दिल में...
बचा होगा कोई टुकड़ा;
जिसमें होगा...
सपना अपना !
ढूँढ रही हूँ मैं...!
रिश्तों के भँवर में...
मैं नारी !
✍ Sheela S

