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चाहत हमारी....


चाहत हमारी कुछ बड़ी न थींथोड़ी खुशियों की आरज़ू इतनी बड़ी न थीं

हमने यह सोचकर ज़ुल्म किया किअपनों कीं रुसवाइयाँ इतनी भी बड़ी न थीं

— ✍ Sheela S
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